Wednesday, January 19, 2022

‘The Lost Daughter’ उर्फ मातृत्व से आज़ादी

‘The Lost Daughter’ फ़िल्म पर कोई भी बात करने से पहले प्रसिद्ध नारीवादी चिंतक सिमोन द बुआर की एक पंक्ति दर्ज़ कर लेते हैं। शायद यह पंक्ति इस फ़िल्म को सही रूप में समझने में सहायक होगी। सिमोन कहती हैं – “मैं इतनी बुद्धिमान हूं, इतनी साधन-संपन्न हूं कि कोई भी पूणतः मेरे ऊपर स्वामित्व स्थापित कर ही नहीं सकता। मुझे न कोई पूरी तरह जानता है और न प्यार ही करता है। केवल मैं ही अपने पास हूं।”

अब ‘The Lost Daughter’ फ़िल्म पर आते हैं। खोने और पाने का सिद्धांत एकदम सरल है। जब इंसान कुछ खोता है तो ठीक उसी वक्त कुछ पाता भी है और जब कुछ पाता है तो उसी वक्त कुछ खोता भी है। अब यह खोना-पाना कितना सफल है और कितना सार्थक, कई बार यह एक निहायत ही व्यक्तिगत प्रश्न बन जाता है क्योंकि दुनियावी अर्थों में जिसे पाना कहा या माना जाता हो संभव है कि वो पाना नहीं बल्कि खोना हो और जिसे खोना मान लिया जाता है दरअसल वही पाना हो या आप वही पाना चाहते हैं। दुनिया आज जहां भी पहुंची है वहां सबसे बड़ी समस्या यह है कि इस पर नियतिवाद और पूर्वनिर्धारित मान्यताओं का बोझ इतना विशाल है कि जन्म से मृत्यु तक सबकुछ निर्धारित सा हो गया है कि एक सफल जीवन जीने के लिए एक मनुष्य को कब, क्या करना चाहिए। जहां तक सवाल स्त्रियों का है तो उनके मामले में तो यह और भी ज़्यादा गहराई तक समाया विचार है कि उन्हें परम्परा, सभ्यता, संस्कृति, धर्म आदि के हिसाब से कब किस भूमिका का निर्वहन करके अपनी सार्थकता सिद्ध करनी है; ऐसा करने में चाहे उनका अपना स्व का वजूद ही क्यों न समाप्त हो जाए। अब यह स्व का मामला जिन्हें समझ में आता है तो आता है वरना तो पूरी दुनिया ही एक भीड़ है जो धर्म, संस्कृति और कर्तव्य के डंडे से अनन्तकाल से एक सीध में चलाई जा रही है।


व्यक्ति एक सामाजिक इकाई होते हुए एक व्यक्तित्व भी है, इस बात का स्थान यहां लगभग न के बराबर हो गया है लेकिन अगर कई किसी भी वजह से अपने निहायत निजी वजूद को लेकर प्रखर हो तो? इसी प्रश्न का उत्तर ठुंढती है यह फ़िल्म ‘The Lost Daughter.’ और इस खोजबीन में वो किसी का पक्ष नहीं लेती और ना ही नायक और खलनायक का ही निर्धारण करती है बल्कि जो जैसा है या हो गया है उसे उसी रूप में प्रदर्शित करने की (लगभग) यथार्थवादी चेष्टा करती है। वैसे यथार्थ भी कभी इतना सरल और एक रेखकीय कहां रहा है बल्कि उसका भी स्वरूप बहुआयामी ही है। रहा सवाल दुनिया का कुछ होना या हो जाता तो यह भी संभव है ही कि कई मायने में यह एक क़ैदखाना भी हो गया हो!

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धर्म, संस्कृति, सभ्यता, सामाजिकता, राजनीति आदि आदि नाम पर सबसे ज़्यादा अगर किसी चीज़ का गला घोंट गया है तो वह है व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता। हालांकि इनके बहुत सारे सकारात्मक और सुरक्षात्मक पक्ष भी हैं लेकिन बंधने भी एक से एक हैं, शायद इन्हीं बंधन से तंग आकर लोग कई बार विद्रोही और प्रयोगवादी हो जाते हैं। चार्ली चैप्लिन जैसा कलाकार भी यह चीत्कार व्यक्त कर जाता है कि “जीवन अदभुत हो सकता है अगर लोग आपको अकेला छोड़ दें।”

यह अकेला होना कहीं गुफाओं में जाकर किसी अवर्णित, अनदेखे और अलौकिक सुख का आह्वान करना नहीं है बल्कि अपने साथ होना है, दूसरे को कष्ट दिए बिना जैसा चाहते हैं वैसा जीवन गढ़ना है, अपनी तरह से जीना है और एक वाक्य में कहें तो यह अकेलापन तमाम थोपी मान्यताओं के विरुद्ध आज़ादी का जयघोष है। कुछ वैसे ही जैसे बाज़ार में रहते हुए न दुकानदार होना और ना ही ख़रीदार होना है। वो अकबर इलाहाबादी ने अपनी एक ग़ज़ल में कहा है न –

दुनिया में हूं दुनिया का तलबगार नहीं हूं
बाज़ार से गुज़रा हूं ख़रीदार नहीं हूं
या रब मुझे महफ़ूज़ रख उस बुत के सितम से
मैं उस की इनायत का तलबगार नहीं हूं 

मातृत्व और पत्नीत्व स्त्रियों के लिए वरदान और सबसे बड़े गुण के रूप में प्रचारित किया गया है। इसको लेकर एक से एक साहित्य, सिनेमा और पता नहीं क्या-क्या रचा गया है। एक स्त्री बेटी है, बहु है, माँ है, इज़्ज़त है आदि आदि का जाप भी अनगिनत सालों से बुलंद किया गया है और यही सर्वस्वीकृत भी है। यह तमाम उपाधियां निश्चित ही पुरुषवादी सामंती समाज की परिकल्पना है, स्वभाविक नहीं।

The Lost Daughter एक पत्नी और दो बच्चों की मां लेड़ा (ओलिविया कोलमन और जेसिया बुकले) के माध्यम से इन्हीं मान्यताओं को बड़ी ही शालीनता से नकारने की गाथा कहती है। लेड़ा अपनी नियति केवल मां, पत्नी और प्रेमिका के रूप में नहीं देख पाती और एक समय वो मातृत्व, पत्नीत्व और प्रेमिकात्व से परे अपना वजूद तलाश करने को निकल पड़ती है और अपने हिसाब से जीवन जीती है। ऐसा करते हुए वो ना तो अपने बच्चों से प्यार करना छोड़ती है और ना ही अपने पति को ही दोष देती है, ना ही अपनेआप को देवी समझती है, उसे बस अपने तरह से जीना है। वो कहती भी है कि “मैं स्वार्थी हूं।” यह स्वार्थी होना उतना भी बुरा तो नहीं ही है जितना कि प्रचारित किया गया है। उसका पति उसे पहले तो संवेदनात्मक रूप से मानता है, बच्चों की दुहाई देता है और जब वो किसी भी प्रकार वापस लौटने को तैयार नहीं होती तो उसे बुरा-भला भी कहता है। बेटे डेविस का एक प्रसिद्ध व्यंगात्मक युक्ति याद पड़ रहा है – “जब एक मर्द अपनी राय दे रहा होता है तब वो एक मर्द होता है और जब एक औरत अपनी राय दे रही होती है तो वो एक चुड़ैल होती है।” वैसे अगर देखा जाए तो स्वार्थी होना एक स्वाभाविक सी मानवीय क्रिया मात्र ही तो है, अब कौन कितना स्वार्थी होता है या हो पाता है – यह बात और है लेकिन यहां लेड़ा अपनी पहचान एक स्वतंत्र इंसान के रूप में देखती है, वो किसी और की मर्ज़ी से तो समुद्र किनारे अपना स्थान तक बदलने को तैयार नहीं है। वह समाज द्वारा प्रस्तावित स्त्री के तमाम रूप से वो चिढ़ सी जाती है। उसे वो नहीं चाहिए तो किसी भी शर्त पर नहीं ही चाहिए।

लेड़ा की इस चिढ़न को पटकथा लेखक और निर्देशक मग्गी ज्ञाल्लेहन (Maggie Gyllenhaal) बड़ी कुशलतापूर्वक रच भी पाती हैं। वो शायद इसे इसलिए भी सही, सृजनात्मक और मनोवैज्ञानिक रूप से साकार कर पातीं है क्योंकि वो ख़ुद भी स्त्री और एक शानदार अभिनेत्री हैं। यह बतौर निर्देशक इनकी पहली फ़िल्म है और अगर यह कहा जाए तो कहीं से भी अतिश्योक्ति नहीं होगी कि क्या ज़रूरी और सार्थक शुरुआत है, जिसे बेहतरीन अभिनेताओं की टोली ने और भी यादगार बना दिया है और ख़ासकर लेड़ा की भूमिका में ओलिविया कोलमन (अधेड़) और जेसिया बुकले (जवान) को देखना एक यादगार अनुभूति है। ओलिविया कोलमन तो चरित्र ऐसे जीतीं हैं जैसे कि वो चरित्र (अभिनय) नहीं बल्कि जीवन हो। वो अपनी भूमिका में हर तरह से ऐसे विलीन हो जाती है कि लाख चेष्टा करने पर भी अभिनेता और चरित्र के बीच के भेद को पकड़ पाना लगभग असंभव है और यही तो होता है उत्कृष्ट अभिनय। उनका यह अभिनय वर्ष 2021 के उत्कृष्ट अभिनय के रूप में दर्ज़ और याद किया जाएगा।


‘The Lost Daughter’ को आप नेटफ्लिक्स पर देख सकते हैं|

पुंज प्रकाश
पुंज प्रकाश
Punj Prakash is active in the field of Theater since 1994, as Actor, Director, Writer, and Acting Trainer. He is the founder member of Patna based theatre group Dastak. He did a specialization in the subject of Acting from NSD, NewDelhi, and worked in the Repertory of NSD as an Actor from 2007 to 2012.

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