Chehre : पूर्वानुमति और पुराने हैं।

सन 1956 में एक जर्मन उपन्यास प्रकाशित हुआ था The Dangerous Game, इसके लेखक थे फ्रेडरिक दुरेन्टमेंट। वैसे जर्मन में इसका नाम था Die Panne जिसका अंग्रेज़ी में अर्थ होता है The Breakdown, जिसको अंग्रेज़ी में The Dangerous Game नाम से प्रकाशित किया गया। वैसे यह शुरुआती रूप में मूलतः एक रेडियो नाटक के रूप में लिखा गया था लेकिन फिर इसे तुरंत ही गद्य रूप देकर उपन्यास के रूप में लिखा और प्रकाशित किया गया, जो काफी चर्चित भी रहा। ख़ुद लेखक का कहना है कि वो Maupassant की किसी लघुकथा और Edgar Wallace के उपन्यास The Four Just Men के प्रभाव में इस उपन्यास की रचना कर रहे थे। रेडियो नाटक और उपन्यास के प्रकाशन के चार वर्ष बाद अर्थात 1960 में James Yaffey इसे नाटक के रूप में The Deadly Game नाम से प्रस्तुत किया। यह उपन्यास धारावाहिक के रूप में 1957 में यह Die Panne नाम से जर्मन टीवी पर प्रसारित होता है। तब से लेकर अब तक दुनिया की अनगिनत देशों/भाषाओं में यह भिन्न-भिन्न रूप उपस्थित होता है। ख़ुद हिंदी में यह Wrong Trun नाम से प्रस्तुत और पसंद किया जाता है। कहा तो यह भी जाता है कि मराठी के प्रसिद्ध नाटककार विजय तेंदुलकर का बहुचर्चित नाटक शांता! कोर्ट चालू आहे (1971) का मूल स्वर भी यही उपन्यास है। अब हिंदी में इसी कथानक पर एक फ़िल्म आई है – Chehre ।

कोरोनकाल में सारे थियेटर बंद थे और लंबे अंतराल के बाद खुले भी तो कड़ाई और बहुत सारे नियम-क़ानून के साथ। वहीं दर्शकों का आलम यह कि वो अभी भी उस स्वछंदता से सिनेमाहॉल में आने को बिल्कुल भी तैयार नहीं हैं जैसा वो कोरोनकाल से पहले आया करते थे। ऐसे में करोड़ों के बजट की कोई फ़िल्म सिनेमाघरों में प्रदर्शित करना निश्चित ही एक बहुत बड़ा जोख़िम का कार्य है। इसके लिए इस फ़िल्म की तारीफ़ करनी पड़ेगी कि तमाम जोखिमों का पता होते हुए भी इसके निर्माताओं ने इसे 27 अगस्त को इसे प्रदर्शित किया, जो अब ओटीटी पर भी आ गई है। दूसरी आवश्यक बात यह कि भारतीय मीडिया के द्वारा ख़तरनाक चुड़ैल बना दी गई रिया चक्रवर्ती भी इस फ़िल्म का एक अहम हिस्सा है। यह दोनों निश्चित ही बड़े ही जोख़िम के काम थे, जो अंजाम दिया गया। इस बात के लिए हम इस फ़िल्म को सार्थक मान सकते हैं। बाक़ी जहां एक सवाल विशुद्ध रूप से सिनेमा का है तो “Chehre” के निर्देशक हैं रूमी जाफ़री, इसके स्क्रीनप्ले और संवाद रंजीत कपूर और रूमी जाफ़री ने लिखे हैं, उपन्यास पर आधारित कहानी लिखने का श्रेय रंजीत कपूर को है और अभिनेताओं में अमिताभ बच्चन, अन्नू कपूर, रघुवीर यादव जैसे दिग्गजों के साथ ही साथ इमरान हाशमी, रिया चक्रवर्ती और धृतिमान चक्रवर्ती का नाम जुड़ा हुआ है। अब जहां तक सवाल अभिनय का है तो बच्चन साहब बार-बार अपने को दुहराने के लिए जाने जाते हैं, अलग-अलग फ़िल्मों में अमूमन उनका केवल आहार्य बदलता है बाकी आंगिक, वाचिक और सात्विक अमूमन एक जैसा ही होता है। रघुवीर यादव और अनु कपूर रंगमंच से सिनेमा में आए निश्चित ही बेहतरीन अदाकारों में से एक हैं लेकिन यहां वो चरित्र से ज़्यादा चरित्र का विद्रूप चित्र (caricature) करते हुए से दिखते हैं। धृतिमान चटर्जी अपनी जगह पर उचित हैं। रिया चक्रवर्ती, कृति खरबंदा और क्रिस्टेला डिसूजा के पास करने को कुछ ख़ास था नहीं और उन्होंने कुछ ख़ास किया भी नहीं। जहां तक सवाल इमरान हाशमी का है तो उनके लिए अभिनय नामक शब्द का कोई ख़ास अर्थ है ही नहीं। रहा सवाल सिद्धार्थ कपूर और समीर सोनी का तो उनके पास इतना स्क्रीन टाइम ही नहीं है कि वो कुछ भी यादगार रच पाते। अब ज़रा कल्पना कीजिए कि कुल ग्यारह चरित्र में रचित किसी सिनेमा में आठ चरित्र का कोई ख़ास वजूद ही नहीं होता तो वो सिनेमा कैसा होगा।

बड़े उपन्यास (वैसे उपन्यास का विन्यास बड़ा ही होता है) पर काम करते हुए यह भय हमेशा रहता है कि मूल कथा को पकड़ने के चक्कर में बाक़ी बेहद आवश्यक चीज़ें और सहायक कथानक गौण हो जाती हैं, यहां भी वही हुआ है और इस वजह से चीज़ें बहुआयामी होने के बजाए एक ही दिशा की ओर भागती प्रतीत होती हैं और इस प्रकार चीज़ें थ्री डी होने के बजाए सपाट बनकर उभरती हैं। दो घंटे और बीस मिनट की फ़िल्म “Chehre” के साथ भी यही त्रासदी घटित होती है।

लगभग पूरी फ़िल्म एक कोर्टरूम ड्रामा के रूप में परिकल्पित है और ज़्यादातर एक ही लोकेशन पर घटित होती है। ऐसी फ़िल्मों में पटकथा में कसावट के साथ ही साथ गति बनाए रखना एक चुनौती का काम है लेकिन जगत प्रसिद्ध फ़ार्मूला का साक्षात उदाहरण के साथ ही साथ पुराना माल नया पैकेजिंग वाले फ़िल्म “Chehre” के साथ यह अतिआवश्यक कार्य भी घटित नहीं होता है और फिल्म बेवजह थोड़ी ज़्यादा खींचीं हुई प्रतीत होती है। यहां तक कि बच्चन साहब की आख़िरी वक्तव्य (Closing Statement) बेहद लंबा और विषयांतर होकर अंततः बोरियत को ही प्राप्त होता है, यह उन्हीं के द्वारा अभिनीत फ़िल्म पिंक की कॉपी जैसी लगती है वहीं शुरुआत में भी उनके द्वारा अभिनीत चेहरे नामक कविता के बोल तो ठीक ठाक हैं किंतु उसका भी कोई ख़ास वजूद समझ के परे हैं।

फ़िल्म “Chehre” का जोनर mystery thriller है, ऐसी फ़िल्मों में कुछ भी पूर्वानुमति होना फ़िल्म के आकर्षण को कम ही करता है और यह कहा जाए तो शायद ग़लत न होगा कि पूरी की पूरी फ़िल्म पूर्वानुमान से घनघोर रूप से भरी पड़ी है, इसलिए वहां कुछ भी नवाचार घटित नहीं होता और फिर रसिक का रसभंग होता है और नींद जैसी कुछ खुमारी सी आने लगती है। 


Chehre (चेहरे) फ़िल्म अमेज़न प्राइम वीडियो पर उपलब्ध है |

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पुंज प्रकाश
पुंज प्रकाश
Punj Prakash is active in the field of Theater since 1994, as Actor, Director, Writer, and Acting Trainer. He is the founder member of Patna based theatre group Dastak. He did a specialization in the subject of Acting from NSD, NewDelhi, and worked in the Repertory of NSD as an Actor from 2007 to 2012.