Sunday, September 19, 2021

‘The Empire’ Ending, Explained in Hindi : बादशाह से बड़ी होती है, बादशाहत

एलेक्स रदरफोर्ड ने मुग़ल सल्तनत के 6 बादशाहों को केन्द्र में रख कर उपन्यास श्रृंखला ‘एम्पायर ऑफ़ द मुग़ल’ लिखा था और इन उपन्यासों का प्रकाशन वर्ष 2009 से 2015 के बीच हुआ था | ‘द एम्पयार’ (The Empire) वेब सीरीज़ का पहला सीज़न रदरफोर्ड के उपन्यास श्रृंखला की पहली किताब ‘रेडर्स फ्रॉम द नार्थ’ पर आधारित है | पहले सीजन का निर्देशन मिताक्षरा कुमार ने किया है जो इससे पहले संजय लीला भंसाली की बाजीराव मस्तानी और पद्मावत में सहायक निर्देशक रह चुकी हैं | 

‘द एम्पयार’ (The Empire) वेब सीरीज़ ऐतिहासिक काल्पनिक पीरियड ड्रामा है | इस सीरीज़ में कुल आठ एपिसोड हैं जिनमें बाबर की ताजपोशी से लेकर उसकी मृत्यु तक की कहानी दिखायी गई है | 


‘The Empire’ Plot Summary in Hindi – ‘द एम्पायर’ की कहानी

‘द एम्पयार’ (The Empire) की शुरुआत 1526 ईस्वी में बाबर (कुणाल कपूर) और इब्राहिम लोदी के बीच चल रहे युद्ध के दृश्यों से होती है | “ज़िन्दगी मौत से कितना ही लड़े, जीत तो आखिर मौत की होती है. 14 साल की उम्र से मौत को धोखा देते आ रहे हैं हम” बाबर के इन संवादों के साथ कहानी फ़्लैशबैक में 30 साल पीछे, समरकंद जाती है | जहाँ शायबनी खान (डीनो मारिया) का आतंक बरस रहा था | वह समरकंद के बादशाह और उनके तीनों शहजादों को मौत के घाट उतर कर अपनी बादशाहत कायम करता है | शायबनी ने समरकंद के आस-पास स्थित दूसरी सल्तनतों को भी अपनी बादशाहत स्वीकार करने का सन्देश भेजा | इनमें से फ़रग़ाना भी एक रियासत थी | जहाँ का शासक उमर शेख़ मिर्ज़ा था | ज़हीरुद्दीन मुहम्मद उर्फ बाबर इसी उमर शेख़ का बेटा था | उमर शेख़ एक नेकदिल, शेरो-शायरी का शौक़ीन इंसान था | तख़्त संभालने के लिए जिस सख्त मिजाज़ की ज़रूरत होती है वह उमर शेख़ में नहीं था | इसी वजह से वह अपने पुरखों की बनाई सल्तनत में से समरकंद, काबुल और हिन्दुकुश अपने रिश्तेदारों में बाँट चुका था | अब उसके पास एकमात्र रियासत फ़रग़ाना बची थी | जिस पर शायबनी की गिद्ध नज़र पड़ चुकी थी | बाबर अपने पिता से बहुत प्रभावित था | बाबर के ऊपर पिता का प्रभाव उसकी नानी ऐसान दौलत (शबाना आज़मी) के लिए चिंता का सबब था | क्योंकि ऐसान दौलत बाबर को एक मज़बूत बादशाह के तौर पर देखना चाहती थी | एक ज़लज़ले में उमर शेख़ की मौत के बाद 12 साल की उम्र में बाबर की ताजपोशी कर दी जाती है | किशोर बाबर को पिता के जाने के बाद अपनी भावनाओं, शायबनी की दुश्मनी और अपने महल के भीतर होने वाले षड्यंत्रों का एकसाथ मुक़ाबला करना पड़ता है | ऐसे मुश्किल दौर में नानी ऐसान दौलत और सिपहसालार वज़ीर खान षड्यंत्रों और दुश्मनों के विरुद्ध बाबर की ढाल बनकर खड़े रहते हैं |


शायबनी कौन था ?

शायबनी, बाबर की ज़िन्दगी में लगा वह ग्रहण था जो उसे बादशाह के तौर पर चमकने नहीं दे रहा था | बाबर, शायबनी से युद्ध करने के लिए समरकंद पर चढ़ाई तो कर देता है लेकिन आगे के नतीजे बताते हैं कि ऐसा करना किशोर बाबर का बचपना था | शायबानी की ताक़त को कम करके आँकने का नतीज़ा यह निकला कि समरकंद तो सपना ही रह गया और फ़रग़ाना से भी हाथ धोना पड़ा | बाबर दर-दर भटकने के लिए मजबूर हो गया | लेकिन जल्दी ही उसके  हाथ एक मौका लगा | समरकंद में शायबनी अपना प्रतिनिधि नियुक्त कर वहाँ से जा चुका था और समरकंद के कुछ असंतुष्ट लोग बाबर की मदद करने को तैयार थे | बाबर ने हाथ आए मौके को ज़ाया नही होने दिया और समरकंद को फतह कर लिया |


बाबर की ज़िन्दगी की इबारत लिखने वाली औरतें  

ऐसान दौलत (शबाना आज़मी) राजनीतिक दाँव-पेंच समझने वाली एक तेज़ दिमाग और मज़बूत इरादों वाली महिला थी | उसका विश्वास था कि “बाबर बादशाह बनने के लिए पैदा हुए हैं |” पहले फ़रग़ाना और फिर समरकंद की सल्तनत पर बाबर की दावेदारी को चुनौती देने वाले, ऐसान दौलत की अक्लमंदी से पार नहीं पा सके | 

एक बार फिर शायबनी नाम का तूफ़ान बाबर की ज़िन्दगी में आया | शायबनी ने समरकंद की घेरे बंदी कर दी | महीनों घेरेबंदी के कारण किले के भीतर का आनाज खत्म होने लगा और जनता भूखों मरने लगी | समरकंद की खस्ताहाल स्थिति को देख कर बाबर अपनी हार मानते हुए शायबानी से समझौते की बात करता है | शायबानी, बाबर को उसके परिवार समेत समरकंद छोड़ने की इज़ाजत दे देता है, सिवाय खानज़ादा के | 

खानज़ादा (दृष्टि धामी) बाबर की बड़ी बहन है | वह समरकंद की जनता और अपने परिवार की सलामती के लिए खुद की गुलामी स्वीकार कर लेती है | अपनी बहन का शायबनी के हरम में होना बाबर से बर्दाश्त नहीं होता | वह शराब और अय्याशी में डूब जाता है | ऐसे में एक बार फिर ऐसान दौलत सामने आती है और बाबर के आत्मसम्मान को झकझोरती है | नतीज़न बाबर अपनी बहन को वापस लाने के लिए छोटे-छोटे कस्बों को जीत कर एक बड़ी फौज़ खड़ी करने की मुहिम में जुट जाता है | उधर समरकंद में खानज़ादा शायबानी का विश्वास और प्यार जीतने में कामयाब रहती है और दोनों का निकाह हो जाता है | 


बाबर खानज़ादा को शायबनी की कैद से रिहा करा पाता है ? 

अंततः बाबर अपनी खानज़ादा आपा को शायबनी के चंगुल से छुड़ाने के लिए समरकंद के किले की घेरेबंदी करके बैठ जाता है | लेकिन महीनों के इंतजार के बाद भी शायबनी की हिम्मत ना टूटती देखकर बाबर को बहुत हैरानी होती है | खानज़ादा जो अब समरकंद की मल्लिका है, शायबनी की मौजूदगी में बाबर से मिलती हैं और उसे वापस लौट जाने के लिए कहती है | साथ ही संकेतों में किले में सुरंग होने का राज़ भी बता देती है | अब बाबर के लिए समरकंद को जीतना मुश्किल नहीं रह जाता | बहन खानज़ादा अक्लमंदी से काम लेते हुए लगातार शायबनी की विश्वासपात्र बने रहने का नाटक करती है | वह शायबनी के साथ समरकंद से भाग जाती है और जाते-जाते अपने सबसे खास व्यक्ति को गोपनीय जानकारी देकर जाती है, जिसके आधार पर बाबर का साथ देने वाला शाह शायबनी तक पहुँच जाता है | खानजादा ने दिल और खून के बीच खून को बहुत पहले ही चुन लिया था | वह शायबनी से कहती है “हमारी वफादारी सिर्फ हमारे खून से है. दिल ने आपसे बाँधा है और खून ने बाबर से, खून के लिए दिल को फ़ना होना पड़ेगा |” इस तरह बाबर की ज़िन्दगी से शायबनी नाम का ग्रहण छंटता है | 


‘The Empire’ Ending, Explained – ‘द एम्पायर’ का अंत

इसके बाद कहानी 18 साल आगे पहुँचती है | यहाँ हम बाबर को काबुल पर राज करते हुए देखते हैं | अब तक बाबर के दो बेटे हुमायूँ (माहम, बाबर की पहली पत्नी, का बेटा) और दूसरा कामरान मिर्ज़ा (काबुल की शाहज़ादी और बाबर की दूसरी पत्नी गुलरुख का बेटा) बड़े हो चुके हैं | बाबर हिन्दुस्तान फतह करने के अपने सपने को पूरा करने के लिए लोदी वंश के शासक इब्राहिम लोदी से युद्ध करने की ठानता है | बाबर और इब्राहिम लोदी की सेनाएँ पानीपत के मैदान में युद्ध के लिए उतरती हैं | लोदी की मज़बूत सेना के सामने जब बाबर की हालत पस्त हो रही थी तब हुमायूँ के आने और तोप, बारूद इस्तेमाल करने की नई जानकारी के कारण बाज़ी पलट जाती है | अंततः बाबर पानीपत की लड़ाई जीत कर हिन्दुस्तान पर भी अपना साम्राज्य स्थापित कर लेता है | 

शायबनी का खात्मा और हिन्दुस्तान में अपनी सल्तनत कायम कर जब बाबर अपनी सारी मुश्किलों से निजात पा चुका था, तब अपना उत्तराधिकारी चुनने का संकट उसके सामने आ खड़ा हुआ | हुमायूँ ने लोदी के खिलाफ युद्ध में खुद को साबित किया था इसलिए खानज़ादा के साथ-साथ बाबर भी उसे भावी बादशाह के रूप में देखना चाहता था | लेकिन गुलरुख के विद्रोही तेवर और कामरान मिर्ज़ा की नाराज़गी पिता को किसी फैसले पर पहुँचने नहीं देती | 

उत्तराधिकार के इस मसले को सुलझाए बिना बाबर की मौत हो जाती है | गुलरुख हर हाल में अपने बेटे कामरान के लिए हिंदुस्तान की सल्तनत तय कर देना चाहती है | ऐसे मौके पर खानज़ादा निर्णायक भूमिका निभाती है | वह बाबरनामा में लिखी बाबर की ख्वाहिश का ज़िक्र करते हुए हुमायूँ को बादशाह घोषित कर देती है | 


बाबर की ख्वाहिश की हक़ीकत 

आखिरी दृश्य से हमें स्पष्ट होता है कि वास्तव में बाबर एक बादशाह की तरह नहीं बल्कि एक पिता की तरह सोच रहा था | उसने कामरान को उत्तराधिकारी बनाने का फैसला कर लिया था | लेकिन खानज़ादा ने बाबर की मौत के बाद बाबरनामा में फेरबदल करते हुए हुमायूँ की तकदीर में बादशाहत लिख दी |  


‘द एम्पयार’ (The Empire) को आप डिज़्नी प्लस हॉटस्टार पर देख सकते हैं |

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Suman Lata
Suman Lata
Suman Lata completed her L.L.B. from Allahabad University. She developed an interest in art and literature and got involved in various artistic activities. Suman believes in the idea that art is meant for society. She is actively writing articles and literary pieces for different platforms. She has been working as a freelance translator for the last 6 years. She was previously associated with theatre arts.

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