‘Squid Game’ Korean Series: एक विद्रूप खेल

हाल के दिनों में दुनिया भर में सबसे ज़्यादा लोकप्रिय वेबसीरीज़ Squid Game पर अगर हम नज़र डालते हैं तो यह पता चलता है कि अमूमन वो ही वेबसीरीज़ सबसे ज़्यादा देखे और बेहद पसंद किए गए जिनमें भयंकर अराजकता से परिपूर्ण इंसानियत की बातें हों, पागलपन, थ्रिल और पैसों जा जुनूनी खेल है। अब वो चाहे मनी हाइस्ट हो, ब्रेकिंग बैड हो या फिर अभी-अभी आई स्क्विड गेम हो। यह तभी सम्भव है जब समाज अराजक और आदर्शविहीन होकर पैसा और ताक़त की अंधी दौड़ में डूब जाए और सारे के सारे आदर्श किसी न किसी कारण से धुंधले होकर किसी कोने में पड़े हांफने लगें। तो क्या यह मान लिया जाए कि आज हम ऐसे ही एक समय में जी रहें हैं जहां हर आदमी अपनी ही आवश्यकताओं के हाथों असहाय है और और व्यवस्था आत्मनिर्भर होने की बात करके अपना पल्ला झाड़ ले रही है। जिनके पास दौलत है तो इतना ज़्यादा है कि उसका होना भी उन्हें कोई सुकून नहीं देता बल्कि एक कंगाल और एक पैसेवाला दोनों ही अतृप्त और भीषण रूप से प्यासे है! सुकून और सुख किसी के पास नहीं क्योंकि पूंजी पर आधारित समाज में एक को चीज़ें मिलती नहीं हैं और दूसरे के लिए किसी भी चीज़ का कोई ख़ास महत्व बचता नहीं है। फिर दोनों अपने-अपने सुकून की प्राप्ति के लिए अलग-अलग उपक्रम करता है।

यह उपक्रम आज से नहीं बल्कि तब से चला आ रहा है जबसे इंसान समाज में वर्ग का निर्माण हुआ और व्यक्तिगत सम्पति का उदय भी। इंसानी दिमाग बेहद ज़रूरी चीज़ों तक ही नहीं बल्कि उससे कहीं और ज़्यादा पर केंद्रित होने लगा। इंसान रूपी यह प्राणी जीव से ज़्यादा उपभोक्ता के रूप में परिवर्तित हुआ। चंद मदारी और बहुतायत खिलाड़ी का निर्माण हुआ और आंनद की प्राप्ति की यह महत्वकांक्षा इतनी विद्रूपता को प्राप्त हो गई कि वो अपने मनोरंजन मात्र के लिए एक इंसान को दूसरे इंसान का प्रतिद्वंद्वी बनाकर खड़ा कर देता है और तब तक उसे मज़ा नहीं आता जब तक एक इंसान दूसरे की जान न ले ले। लड़ने वाला इंसान जीतने के लिए कुछ भी कर गुज़रने को तैयार है, उसकी न कोई नैतिकता बचती है और ना ही कोई मर्यादा ही। उसे बस जीतना होता है। उसे ऐसा प्रतीत होता है कि अगर वो जीत गया तो सब सही हो जाएगा। जैसे महाभारत में पांडव को लगता था और वेटिंग फ़ॉर गोदो में लकी और पोज़ो को, लेकिन उन्हें इसका एहसास ही नहीं कि जीतने के पश्चात वो जिस अवस्था को प्राप्त होते हैं वहां विद्रूपताओं के सिवा कुछ है ही नहीं।

कोरियन वेबसीरीज़ Squid Game ऐसी ही एक कहानी है, जहां कुछ लोग मज़े के लिए मौत के खेल का आयोजन करते हैं और विभिन्न-विभिन्न कारणों से कुछ मजबूर और असहाय लोग उस खेल में स्वेक्षा से हिस्सा लेते हैं। यहां खेल में हारने का अर्थ मौत है और जीतने का अर्थ बहुत सारा पैसा; लेकिन लगभग चार सौ से भी ज़्यादा खिलाड़ियों में से जीतना किसी एक को ही है। तो अब शुरू होता है क्रूरता, साजिश, धोखा और छल का थ्रिलिंग महाभारत। इंसान और जानवर में कोई ख़ास फ़र्क बचता नहीं हैं। इस सीरीज़ में एक संवाद भी कुछ ऐसा ही है – “You bet on horses. It’s the same here, but we bet on people.” क्या आर्थिक तंगी, वर्गीकरण, पूंजीवाद, भीड़वादी संस्कृति और एक दूसरे की गलाकाटू सोच वाले समय और समाज में लगभग हर स्थान पर यही सबकुछ नहीं चल रहा है प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में? क्या यही वो वजह नहीं है कि आते ही यह और इस प्रकार के सीरीज वैश्विक रूप से सनक (Cult) बन जाते हैं! कला समाज का ही एक प्रतिरूप है, थोड़ी सच्चाई तो इस बात में भी है ही। हां, सच यह भी है कि कई बार समाज कला को गढ़ता है, तो कई बार कला भी समाज को गढ़ने में अपना बहुमूल्य योगदान देता है लेकिन जहां कला व्यवसायिकता से ज़्यादा संचालित हो वहां समाज गढ़ने की बात करना बेमानी है।

लेखक निर्देशक  Hwang Dong-hyuk के Squid Game सीरीज़ के पहले भाग में कुल नौ एपिसोड हैं, जिसमें विभिन्न चरित्रों को निभाते हुए अभिनेता Lee Jung-jae, Park Hae-Soo, Wi Ha-Joon, Jung Ho-Yeon, O Yeong-Su, Heo Sung-Tae, Anupam Tripathi और Kim Joo-Ryoung बचपन में खेले जानेवाले खेल को खेलते हैं जहां हारने का अर्थ मौत की प्राप्ति है और इस प्रकार मनोरंजन मात्र के लिए खेला जानेवाला खेल क्रूर, हिंसक और जानलेवा बनकर सामने आता है।

कोरियन मनोरंजन उद्योग वैसे ही थ्रिल और हिंसक अतिवाद के लिए जाना जाता है लेकिन ऐसे कथ्य में भी इंसानियत को सहेजना और आख़िरकार उसके पक्ष में ही खड़े होना इनकी सबसे बड़ी ताक़त रही है। यहां भी इस परम्परा का बख़ूबी निर्वाहन किया गया है और यही इस सीरीज़ की सबसे अनमोल बात भी है। सीरीज़ पर मनी हाइस्ट के आहार्य (कपड़े और मास्क) का प्रभाव देखने को मिलता है, यह इसकी सबसे कमज़ोर कड़ी है, छायांकन और संपादन बढ़िया है, थ्रिल और ठहराव दोनों ही अच्छे से प्रदर्शित और उद्घाटित होता है। कथानक में गति है और इस गति को उचित तरीक़े से संजोया भी गया है। ट्विस्ट और टार्न भी अच्छे हैं। इन सबके बावजूद जो चीज़ इस सीरीज़ में आपको सबसे ज़्यादा प्रभावित करती है वह है इसका पार्श्व संगीत। इसमें नयापन है, अर्थवान है और किसी भी प्रकार के शोर से रहित है।

Squid Game हिंदी और अंग्रेज़ी सहित कई अन्य भाषाओं में भी प्रदर्शित किया गया है लेकिन किसी भी सीरीज़, फ़िल्म या अन्य को उसके मूल भाषा में ही देखना चाहिए क्योंकि अभिनेता द्वारा अभिनीत भाषा का भाव सही रूप में वहीं महसूस करने को मिलता है वैसे भी भाव के बिना भाषा अर्थहीन है।


Squid Game नेटफ़िल्क्स पर देखी जा सकती है | 

फिल्मची के और आर्टिकल्स यहाँ पढ़ें।

पुंज प्रकाश
पुंज प्रकाश
Punj Prakash is active in the field of Theater since 1994, as Actor, Director, Writer, and Acting Trainer. He is the founder member of Patna based theatre group Dastak. He did a specialization in the subject of Acting from NSD, NewDelhi, and worked in the Repertory of NSD as an Actor from 2007 to 2012.