#Home : साधारण जीवन के असाधारण रंगों की तलाश करती फिल्म

पिछले कुछ दशकों के भीतर संचार तकनीक के क्षेत्र में रॉकेट की गति से बदलाव आए हैं | इसमें दो राय नहीं है कि यह बदलाव हमारे जीवन में बहुत सारी सहूलियत ले कर आए हैं, लेकिन इस बात से भी मुँह नहीं फेरा जा सकता है कि इन सुविधाओं की भारी कीमत हमें चुकानी पड़ रही है | खासतौर से स्मार्टफ़ोन और सोशल मीडिया ने इंसानी मन और दिमाग पर गहरा असर डाला है | लेखक और निर्देशक रोजिन थॉमस ने अपनी फ़िल्म ‘#Home’ में इन्हीं प्रभावों की पड़ताल करने की कोशिश की है | मलयालम भाषा में बनी यह ‘#Home’ परिवार और संबंधों पर आधुनिक तकनीक के पड़ने वाले प्रभावों को बेहद संवेदनशीलता के साथ सामने लाती है | 


परिवार की कहानी लेकिन पारिवारिक मेलोड्रामा नहीं   

‘#Home’ फ़िल्म केरल के एक परिवार की कहानी दिखाती है | जिसका केन्द्रीय पात्र ओलिवर ट्विस्ट (इन्द्रां), एक ऐसा व्यक्ति है जो तेजी से बदलते समय के साथ खुद को बदल नहीं पाया | कुछ दशक पहले तक उसकी वीडियो कैसेट की दुकान खूब चला करती थी | लेकिन सी.डी., डी.वी.डी. आने के बाद वीडियो कैसेट का चलन खत्म हो गया | तब से ओलिवर लगभग बेकाम सा हो गया है, अब उसका ज्यादातर समय अपने टेरेस गार्डन की देखभाल में और बचपन के दोस्त सूर्यन (जॉनी एंटनी) के साथ बातचीत करने में जाता है | पत्नी कुट्टियाम्मा (मंजू पिल्लै) सेवानिवृत्त नर्स है | वह दिनभर घर के कामकाज में लगी रहती है | पिता अप्पाचन (कैनाकारी धन्यवादराजी) कभी टाइपिस्ट हुआ करते थे | फ़िलहाल तो बुढ़ापे में होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं का सामना कर रहे हैं | ओलिवर के दो बेटे हैं, एंटोनी ओलिवर ट्विस्ट (श्रीनाथ भासी) और चार्ल्स ओलिवर ट्विस्ट (नैस्लेन) | 

बड़ा बेटा एंटोनी फ़िल्म निर्देशक है | वह अपनी पहली फ़िल्म से ही रातोंरात सफल हो गया था | सफलता मिलने से ज्यादा मुश्किल होता है उसकी निरंतरता को बनाये रखना | एंटोनी अपने अगले प्रोजेक्ट को लेकर इसी तरह के दबाव से गुज़र रहा है | साथ ही वह फ़िल्म की कहानी लिखने में एक तरह के रचनात्मक अवरोध का सामना भी कर रहा है | काम को लेकर तनाव और स्मार्टफ़ोन-सोशल मीडिया के अंधाधुंध इस्तेमाल का असर उसके व्यवहार में गुस्से, चिड़चिड़ेपन के रूप में दिखाई देता है | 

बेटा एंटोनी अपने होने वाले ससुर जोसफ लोपेज़ (श्रीकांत मुरली) के आकर्षक व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित रहता है | अपने पिता उसे एक ऐसे हारे हुए इन्सान लगते हैं, जिनके जीवन में बताने लायक कुछ भी नहीं है | ओलिवर अपने बेटे के जीवन में जोसफ जैसी स्वीकार्यता, एहमियत और मान्यता पाने की जद्दोजहद में लगा हुआ है | इसके लिए वह डिजिटल दुनिया को समझने की कवायद भी करता है | ओलिवर की यह कोशिशें रंग लाती है या नहीं, एंटोनी वह नज़रिया हासिल कर पाता है या नहीं जिसके जरिए वह एक साधारण से लगने वाले जीवन की असाधारणता को देख सके ? इन सारे जवाबों के लिए मलयालम भाषा की फ़िल्म ‘#Home’ को इंग्लिश सबटाइटल के साथ देख डालिए |    


अपनेपन की बिगड़ी हुई परिभाषा

कोटा फैक्टरी सीज़न 2 के एक दृश्य में जीतू भैया अपने स्टूडेंट्स से कहते हैं कि, “अपनेपन का तो मतलब ही होता है कि ग्रांटेड फॉर ले पाओ |” अक्सर जीवन में भी लोग अपनेपन का यही मतलब निकालते हैं | इस बिगड़ी हुई सोच का सबसे ज्यादा शिकार परिवार के लोग होते हैं | खासतौर पर बुज़ुर्ग माँ-बाप | फ़िल्म ‘#Home’ में सोशल मीडिया सेलेब्रिटी बनने की हसरत रखने वाला छोटा बेटा चार्ल्स बिस्तर से उठ कर अपना पंखा तक बंद नहीं कर पाता है | इसके लिए वह घर के कामकाज में बुरी तरह व्यस्त माँ को आवाज़ लगाता है और माँ हड्डियों में दर्द होने के बावजूद घर के दूसरे मंजिले पर स्थित उसके कमरे का पंखा बंद करने जाती है | इस छोटे से प्रसंग में यह बात स्पष्ट होती है कि कैसे बच्चे कई बार माँ-बाप की भावनाओं का जबरदस्त दोहन करते हैं | छोटे-छोटे प्रसंगों के ज़रिए रोजिन थॉमस फ़िल्म में आम पारिवारिक जीवन का वह ताना-बाना बुनने में सफल रहते हैं जिसे देखते हुए ओलिवर ट्विस्ट के परिवार में आप अपने परिवार की परछाई देख पाते हैं | 


कहानी दिखाने की सरल भाषा

रोजिन थॉमस, कहानी की तरह ही फ़िल्म बनाने में भी इस सोच को लेकर आगे बढ़ें हैं कि साधारण जीवन की खासियत दिखाने के लिए असधारण तौर-तरीकों के इस्तेमाल से बचा जाए | कहानी दिखाने के तरीके को बहुत सरल रखा गया है | ज्यादा प्रयोग करने की कोशिश नहीं की गई है | 


इन्द्रां का यादगार अभिनय 

अभिनय की बात करें तो इन्द्रां सारी महफ़िल लूट ले गए हैं | अधेढ़ पिता की अपने बड़े होते हुए बच्चों से संवाद स्थापित न कर पाने की बेबसी हो, बच्चों की उपेक्षा से उपजी तकलीफ हो या समय से पिछड़ जाने का अहसास हो इन्द्रां हर तरह के भावों को बेहद नियंत्रित ढंग से स्क्रीन पर दिखाने में सफल हुए हैं | 

अपने पेशेवर दुनिया की उठापटक और व्यक्तिगत जीवन में सामंजस्य न बैठा पाने के कारण परिवार, आस-पास के जीवन से कटे हुए रचनात्मक व्यक्ति के किरदार में श्रीनाथ भासी प्रभावी लगते हैं | मंजू पिल्लै माँ की और नैस्लेन चार्ल्स की भूमिका में केन्द्रीय पात्रों को अच्छा सहयोग प्रदान करते हैं |


न होता यह, तो अच्छा होता 

फ़िल्म की अवधि 2 घंटे 41 मिनट है, जो थोड़ा ज्यादा लगती है | इसे आराम से 15 मिनट कम किया जा सकता था | दूसरी बात यह कि एंटोनी की नज़र में पिता का मूल्य बढ़ाने के लिए उनके गुज़रे जीवन में एक प्रेरक प्रसंग जोड़ा गया है | इसके बिना भी अगर एंटोनी को अपने पिता के साथ किये जा रहे गलत व्यवहार का एहसास हो पाता तो ज्यादा बेहतर होता |  


#Home फ़िल्म अमेज़न प्राइम वीडियो पर उपलब्ध है |

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Suman Lata
Suman Lata
Suman Lata completed her L.L.B. from Allahabad University. She developed an interest in art and literature and got involved in various artistic activities. Suman believes in the idea that art is meant for society. She is actively writing articles and literary pieces for different platforms. She has been working as a freelance translator for the last 6 years. She was previously associated with theatre arts.