Cinema Bandi : तेलगु सिनेमा की बेहद ज़रूरी ‘सिनेमाबंदी’

आज लगभग हर सिनेमाप्रेमी को पता है कि थोड़ा-बहुत ही सही लेकिन भारत में बेहतरीन सिनेमा हिंदी में नहीं बल्कि मराठी, तमिल, तेलगु, मलयालम, बंगाल और असमी आदि भाषाओं में बन रही हैं। वहां विषयों में नवीनता है और प्रस्तुतिकरण में भी, जो अपने देखनेवालों को एक नया और सुखद आस्वाद देता है। ऐसी अमूमन फिल्में नए फिल्मकारों द्वारा बनाई जा रही है और उनमें अमूमन कलाकार भी नए ही हैं। कुछ तो ऐसी भी फिल्में हैं जिनमें पूरे का पूरा दल ही नया है। सिनेमाबंदी (Cinema Bandi) एक ऐसी ही फिल्म है। वैसे किसी ने शायद सत्य ही कहा है कि बदलाव हमेशा नई पीढ़ी ही लेकर आती है, पुरानी तो इस चिंता में घुलती रहती है कि कहीं कुछ बदल न जाए!

मल्टीप्लेक्सों के आगमन के साथ ही साथ या उससे थोड़ा सा पहले ही, सिनेमा की पटकथा के विषयवस्तु से गांव के ग़ायब होने की शुरुआत हो चुकी थी। बहुत सारी यांत्रिकता युक्त थोड़ी हिंसा के साथ अपराध और थोड़ा ग्लैमर के साथ प्रेम के बेहद ही सतही कहानियां सिनेमा के विषयवस्तु को अपने गिरफ़्त में जकड़ चुके हैं, बाक़ी तो बिना तर्क के गानों, नाच आदि को घुसेड़ देने का फार्मूला बहुत पुराना तो है ही। बीच बीच में बेहद मशीनीकृत आदर्श भारतीय सुखी परिवार भी उपस्थित हो जाता रहा है। ऐसे में तमाम आडम्बरों को त्यागकर जब सिनेमाबंदी (Cinema Bandi) जैसी कोई फिल्म आती है तो वो भले ही कोई महान, चमत्कारी, अद्भुत कृति आदि हो या न हो लेकिन उसका एहसास बहुत ताज़ा होता है। वैसे विश्व सिनेमा ऐसे अद्भुत प्रयोगों से कभी अछूता नहीं था, शायद भारत के लिए यह एक नवीन परिघटना हो। एक ऐसे देश में जो प्रयोगवादी से ज़्यादा परम्परावादी होने में सहजता महसूस करता है और एक ऐसा वर्तमान जो लोगों को भविष्यजीवी बनाने के बजाय अतीतजीवी के दलदल में धकेल रहा हो, सिनेमाबंदी जैसी फिल्म की परिकल्पना करना ही अपनेआप में एक साहसिक सोच माना जाना चाहिए। इस सोच की निश्चित रूप से सराहना की जानी चाहिए क्योंकि कला और संस्कृति प्रयोग के मार्फ़त ही अपनी संजीवनी ग्रहण करती है।

एक साक्षात्कार के दौरान वसंथ मारिनगंती लिखित पटकथा को लेकर निर्देशक प्रवीण कंदरेगुल्ला सन 2018 में निर्माता राज और डीके से मिलते हैं। विचारों का आदान-प्रदान होता है और एक कम अवधि की फिल्म बनाने पर सहमति बनती है, जो बाद में पूरी एक फिल्म की शक्ल लेती है और उसका नामांकन होता है – सिनेमाबंदी (Cinema Bandi)। लगभग दो वर्ष की अवधि में फिल्म बनकर पूरी होते है और प्रदर्शन के लिए तैयार होती है लेकिन कोविड19 की वजह से बदली परिस्थियों के अनुसार यह ओटीटी प्लेटफॉर्म पर प्रदर्शित होती है। फिर जिसने भी इसे देखा वो इसके सम्मोहन में आने से शायद ही बच सका। अब यह अलग से बताने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए कि यह निर्देशक, लेखक समेत कई लोगों की पहली फिल्म होती है और राज और डीके की वही जोड़ी है जिनका नाम स्त्री जैसी सफल हॉरर हास्य के साथ ही साथ द फैमली मैन जैसी महत्वपूर्ण सीरीज के साथ भी जुड़ा हुआ है।

वैसे सिनेमाबंदी (Cinema Bandi) जैसी फिल्मों की सबसे बड़ी ख़ूबसूरती यह होती है कि ऊपर से जितनी सहज और सरल दिखाई पड़ती हैं, भीतर से दरअसल अपने अंदर उतने ही बिम्ब और प्रतीकों को समाहित किए हुए होती हैं। इनको अगर पकड़ लिया तो खुल जा सिमसिम हो जाता है वरना तो एक साफ-साफ दिखनेवाली कथा तो प्रवाहित हो ही रही है। अब इसी फिल्म की अगर बात करें तो यह फिल्म अचानक प्राप्त हुआ उपकरण और सिनेमा बनाने और अपनी व अपने समाज की बदहाली को दूर करने के कल्पनालोक की स्वप्नकथा और उससे यथार्थवादी सत्य के टकराव की कथा है, जिसमें चुनौतियां हैं, चयन है, रूढियां हैं, आभाव हैं, अनगढ़ता है और बहुत सारे मासूमियत भी हैं और कुल मिलाकर एक सूक्ष्म हास्य की उत्पत्ति भी करते हैं। इन सबके बीच हमेशा मुंह चलाता हुआ और विचित्र से यथार्थवादी हुलिया और पहनावे में एक पटकथा लेखक भी है, जो पूरी फिल्म में अपनी मौन उपस्थिति के साथ विद्दमान रहता है और जब एकदम अंत में आप इसके लेखक है नामक सवाल का जवाब देता है तब इस चरित्र के बारे में आप पुनर्विचार करने को बाध्य हो जाते हैं। इस और फिल्म में व्याप्त इस जैसे अन्य बिम्ब को पकड़ लिए तो मज़ा और दुगुना हो जाने का मौक़ा बढ़ जाता है।लेखन, निर्देशन, अभिनय, फिल्मांकन और संपादन सहित इस फिल्म का हर पक्ष प्रचलन और लोकप्रिय से ज़रा अलग है और यही बात इसे एक आवश्यक और न भुलनेवाली कृति बनाती है। यह फिल्म जितना यथार्थवादी है, उतना ही प्रयोग और प्रतीकवादी भी।


सिनेमाबंदी (Cinema Bandi) , नेटफ्लिक्स पर उपलब्ध है।

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पुंज प्रकाश
पुंज प्रकाश
Punj Prakash is active in the field of Theater since 1994, as Actor, Director, Writer, and Acting Trainer. He is the founder member of Patna based theatre group Dastak. He did a specialization in the subject of Acting from NSD, NewDelhi, and worked in the Repertory of NSD as an Actor from 2007 to 2012.