Sunday, September 19, 2021

माई नेम इज ख़ान (फिल्म) आज और ज़्यादा प्रासंगिक है!

हर धर्म, विचारधारा के भीतर कम से कम दो तत्व तो होते ही हैं – सही और ग़लत अर्थात नायक और खलनायक। नायक और खलनायक की संस्कृति उससे अलग-अलग होती है और खलनायक को शैतान, राक्षस, असुर, आदि अलग-अलग नाम से परिभाषित किया जाता है और इसका समूल नाश करना ही धर्म का प्रथम कर्तव्य होता है। लेकिन यहां यह भी ध्यान में रखनेवाली बात है कि नायक और खलनायक एक प्रवुत्ति है, कोई व्यक्ति नहीं। एक बुरे और एक अच्छे का प्रतीक है। वैसे हर युग अपने लिए अलग-अलग नायक और खलनायक की परिकल्पना करता है और उसके पक्ष और विपक्ष में खड़ा होता है। पहले यह मूलतः दो संस्कृतियों का संघर्ष हुआ करता था लेकिन साम्राज्य और बाज़ारवाद की उत्पत्ति के साथ ही साथ आजकल यह संसाधनों पर स्वामित्व का संघर्ष भी बन गया है और साथ में अहम का तुष्टिकरण तो है ही। ताकतवर लोग हर बात को अपने कू-तर्कानुसार ढ़ालने की चेष्टा करते हैं और उनका हर कृत्य सही माना लिया या मनवा दिया जाता है लेकिन यह फिल्म माई नेम इज ख़ान एकदम शुरू में ही साफ़ कर देती है कि मज़हब कोई भी हो केवल दो ही प्रकार के मनुष्य का अस्तित्व है – अच्छे और बुरे। इसलिए आगे जब फिल्म के मुख्य चरित्र को जब यह समझाया जाता है कि आप उस लड़की से शादी नहीं कर सकते क्योंकि वो हमारे मज़हब की नहीं है तो उसका साफ़ जवाब होता है – मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है। आज भारत में वैसे विवाह को लव ज़ेहाद मानने की परम्परा चल पड़ी है और अब यहां किसी को पसंद या नापसंद करना दो वयस्क व्यक्तिओं का नहीं बल्कि धीरे-धीरे य राजनीति का विषय बनता जा रहा है। 

“वह भविष्य बहुत दूर नहीं, जब हमें एक बार फिर ग़ैर-बुद्धिमान मनुष्यों से निपटना पड़ सकता है।” – सेपियंस, युवाल नोआ हरारी  

गौर किया जाए तो मानव एक हैं मानव का धर्म एक है का जाप करनेवाला मानव समाज रंग, रूप, लिंग, संस्कृति, वाद, धर्म, जाति, देश, राज्य, गांव, घर, अपना ख़ून आदि पता नहीं और किस-किस नाम पर पता नहीं कितना-कितना विभक्त है और अब तो आलम यह है कि एक ही घर में दो व्यक्ति एक-दुसरे के ख़िलाफ़ हैं। इसी विभाजन को 9/11 (2001) की घटना ने इस कदर आगे बढ़ाया कि पूरा विश्व मुसलमानों के ख़िलाफ़ हो गया जबकि यह कृत्य आतंकवादियों का था जिनके नाम मुसलमान थे और इस जघन्य कृत्य को भिन्न-भिन्न देश के भिन्न-भिन्न राजनीति ने अपने पक्ष विपक्ष में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। यह इतनी बड़ी घटना थी कि इसका प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रभाव हर जगह देखने को मिला। व्यक्तिगत सम्बंध भी इससे अछूते नहीं रहे। भारत में तो हिन्दू मुसलमान के बीच का तनाव सदियों पुराना है जिसको 1947 के बाद 6/12 (1997) ने चरम पर पहुंचाया और जिसकी आग में झुलसकर आज भारत कहां है और किस ओर बढ़ रहा है इसे कोई भी दिमागवाला इंसान आसानी से देख और समझ सकता है। आज आलम यह है कि जो आंख, कान, नाक और दिमाग बंद करके सत्ता के साथ है वो देशभक्त बाक़ी सब देशद्रोही की संज्ञा और सर्वनाम से परिभाषित किए जा रहे हैं और शाम होते ही सोशलमिडिया पर रोज़ युद्ध शुरू हो जाता है और वहीं सबकुछ तय होना शुरू हो जाता है। यहां लोग ख़ुद ही जज है, ख़ुद ही वकील और ख़ुद ही आरोप लागनेवाले भी। वैसे यह अब केवल सोशलमिडिया पर ही नहीं है बल्कि यह अब बड़े ही ख़तरनाक रूप से यथार्थ जगत का भी अंग बन चुका है और लोकतंत्र बड़ी आसानी से भीड़तंत्र में परिवर्तित किया जा रहा है और कमाल यह कि इसमें ज़्यादातर को मज़ा आ रहा है!   

माई नेम इज ख़ान आज और ज़्यादा प्रासंगिक है!

माई नेम इज ख़ान, 9/11 से पहले और बाद के समय का बड़ा ही सत्य और मार्मिक चित्रण करता है, जो रातोरात एक पुरे समुदाय को आतंकवादी की श्रेणी में स्थापित कर देने की करुण चीत्कार है और इसकी जड़ें इतनी ज़्यादा गहरी हो जाती हैं कि बच्चे भी इस हिंसा से बच नहीं पाते और उनके भी दिमाग में कूड़ा ठूंसा जाता है और हत्यारे बन जाते हैं। ऐसे बीमार लोगों सम्मानित करने की घटनाएं भी आज हमारे सामने हैं। 9/11 से पहले जो रिश्ते प्यार, स्नेह के ज्वलंत उदहारण थे उनके बीच भी हिंसा और नफ़रत भर जाता है और बात यहां तक पहुंच जाती है कि एक ख़ान को यह साबित करना होता है कि ‘मेरा नाम ख़ान है और मैं आतंकवादी नहीं हूं।‘ यह कोई काल्पनिक कथा नहीं है बल्कि यह सच्चाई है। गौर करने तो पता चलेगा कि दुश्मन अब बाहर नहीं है बल्कि वो हमारे दिमाग को गुलाम बना चुका है। उसने लोकतंत्र की सारी मजबूत कड़ियों को भीतर से खोखला कर दिया है और हम अब उसके एजेंडे के अनुसार ही सोचने को अभिशप्त हो गए हैं। 

दुनिया जब पुरुत्थानवादियों के चंगुल में फंसकर आगे जाने के बजाए पीछे जाने लगती है तो कला और साहित्य की वो चीज़ें और समाज के वो ज्वलंत सवाल जिनका महत्व और ज़रूरत समय के हिसाब से समाप्त हो जानी चाहिए थी वो और ज़्यादा उपयोगी होकर सामने आ जाती हैं और उसकी प्रासंगिकता और ज़्यादा बढ़ जाती है तो यह ख़ुशी नहीं बल्कि बड़े ही दुःख की बात है। फ़र्क सिर्फ इसी बात से समझा जा सकता है कि सन 2010 में प्रदर्शित यह फिल्म अगर आज बने तो शायद यह सिनेमाहॉल में आसानी से पहुंच भी न पाती, वैसे पहुंचा तो उस वक्त भी नहीं था जब शाहरूख ख़ान ने पाकिस्तानी खिलाड़ियों का आईपीएल में खेलने देने का एक वक्तव्य दिया था तब फिल्म माई नेम इज ख़ान का वहिष्कार शुरू हो गया था जबकि यह फिल्म मानवतावादी दृष्टिकोण की एक जीवंत गाथा है। बहरहाल, फिल्म में काजोल और शाहरुख ख़ान की जादुई जोड़ी है और खान साहब का अभिनय बढ़िया है। आख़िरी के कुछ फिलगुड प्रभाव को छोड़ दिया जाए तो आश्चर्यजनक रूप से करण जौहर ने एक बढ़िया, ज़रूरी और बेहद साहसिक फिल्म बनाई है। नेताओं और दिमाग पकाऊ मिडिया के चंगुल से बचकर इसे देखने, दिखाने और समझने की आवश्यकता है। वैसे यह फिल्म यह सीख भी देती है कि डर के आगे डरने में कोई बुराई नहीं है लेकिन अपने डर को उतना बड़ा भी मत बनाओ वो तुम्हें आगे बढ़ने से रोके। 


माई नेम इज ख़ान फिल्म Disney+Hotstar पर उपलब्ध है।

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पुंज प्रकाश
पुंज प्रकाश
Punj Prakash is active in the field of Theater since 1994, as Actor, Director, Writer, and Acting Trainer. He is the founder member of Patna based theatre group Dastak. He did a specialization in the subject of Acting from NSD, NewDelhi, and worked in the Repertory of NSD as an Actor from 2007 to 2012.

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