Sunday, September 19, 2021

बहुत हुआ सम्मान : सब मज़ाक ही तो है!

चार्ली चाप्लिन पता नहीं कब कहां कहते हैं कि In the end, everything is a gag. अब अन्तः सबकुछ ढ़कोसला ही है तो आख़िरकार इंसान कर क्या रहा है! अधिकतर इंसान जीवन के अर्थ पर कोई चिंतन करता नहीं है वो बस जीता है, निरर्थकता से उसे कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ता। श्रृष्टि के जन्म से लेकर आजतक इंसानों ने अपने लिए कबीलाई, राजतान्त्रिक, सामंती, ओप्निवेशिक, आस्तिक-नास्तिक, क्रांतिकारी, पूंजीवादी, लोकतान्त्रिक, साम्यवादी आदि तरह-तरह की व्यवस्थाएं निर्मित की है लेकिन क्या इन सारी व्यवस्थाओं ने इंसान को असली अर्थों में सुखी बनाने का काम किया है? तो बकवास के अलावा बचता ही क्या है? वैसे हर चीज़ को बकवास कहना भी एक बहुत बड़ा बकवास ही है। बहुत हुआ सम्मान में यही है, मतलब कि सबकुछ है और अंत में कुछ भी नहीं है लेकिन इस कुछ नहीं के चक्कर में बहुत की निर्मम आलोचना भी प्रस्तुत करता है, यही इसका मूल विषय भी है और यही समझने-देखने लायक भी।

फिल्म में एक तो यूपी है और ऊपर से बनारस मतलब कि डबल डोज़। शीर्षक बहुत हुआ सम्मान बनारस की जगत प्रसिद्द, निर्मम, वीभत्स और ग—मज़ाकी कविता से प्रेरित है और यह फिल्म भी तमाम झूठ-सच से गुथ्थम-गुत्था करते हुए यहां ख़त्म होती है कि जीवन क्या है एक अनुभव मात्र; लेकिन क्या सच में जीवन इतना ही है! बहरहाल, अराजकता और फक्कड़पन के बीच तमाम वादों और इरादों की पुंगी बजाती चलती है। पुंगी का यह स्वर सोचने-समझने लायक है कि कैसे बड़े-बड़े आदर्श और भावनात्मक सच-झूठ गढ़के दरअसल अपना धंधा संचालित किया जा रहा है। 

अगर आप वर्तमान और थोड़ा इतिहास के राजनैतिक पक्ष के प्रति सजग हैं तो आसानी से समझ में आएगा कि बड़े-बड़े वादे, नारे और इरादे सब एक अंधा है जिसे कुछ लोग बड़ी ही कुशलतापूर्वक संचालित कर रहे हैं और उसके चक्कर में इंसान घनचक्कर बना हुआ है। अपनी इसी सोच की वजह से यह वर्तमान समय का एक साहसिक सिनेमा बन जाता है, ख़ासकर ऐसे वक्त में जब चाहुओर भय और साज़िश का माहौल है, कब, कहां और कौन किस बात के लिए निशाने पर ले “देशद्रोही” करार दे दिया जाए, नहीं पता। ऐसे वक्त में शुतुर्मुग बनने के बजाए यह सिनेमा एक फार्स रचाते हुए सवाल करने को और भक्त नहीं भागेदार बनने को खुलेआम प्रेरित करती है। 

कई दफ़ा जब सबकुछ रूक जाता है और गंध आने लगती है तब बहुत सारे लोग तलाब में घुसकर बचे खुचे पानी में हिलकोरा मारने लगते हैं ताकि अंदर छुपी मछलियां बाहर आ जाएं और पता चले कि इस तालाब में कितनी भिन्न-भिन्न प्रकार के जीव-जंतु पाए जा रहे हैं। यह वर्तमान वक्त में एक हिलकोरे का प्रयास कहा जा सकता है लेकिन इस हिलकोरेपन में कितना सिनेमा है, यह एक सवाल हो सकता है जो थोड़ा निराश कर जाए लेकिन यह क्या कम है कि ‘चौक्ड’ हुई नाली में कोई लग्घा लेकर हूरने की हिम्मत दिखा रहा है। 

किसी भी बात का एक व्याकरण होता है और व्याकरण न होना भी एक ग्रामर होता है। उसमें क्या-क्या होना चाहिए से ज़रूरी बात होती है कि क्या-क्या नहीं होना चाहिए। यहां थोड़ी निराशा हाथ लगती है। कुछ प्रकरण ऐसे हैं जिनका न होना बहुत हुआ सम्मान को ज़्यादा सार्थक बना सकती थी और इसे निरर्थक हास्य से बचा सकती थी और उसे गति प्रदान कर सकती थी। एक ही पैकेट में बहुत सारा माल परोस देना बिलकुल वैसा ही है जैसे शादी की पार्टी में अपने प्लेट को भिन्न-भिन्न खानों से लबलब भर देना। 

संजय मिश्रा अपने पुरे मिजाज़ में हैं लेकिन अभी भी मसान, आंखोंदेखी और कड़वीहवा ही उनका चरम है। उनका चरित्र शुरुआत में जेएनयू के रमाशंकर “विद्रोही” से प्रेरित लगाता है लेकिन आख़िर तक आते-आते इस चरित्र की जो परिणति होती है वो विश्वास कम मज़ाक ज़्यादा है और जब वो कुएं से निकलके सुपरहीरो जैसा कुछ बन जाते हैं तब मन कह उठता है कि भैयन क्या ग—मज़ाकी चल रही है! रामकपूर का चरित्र अतिवाद से भरपूर और आरोपित है, पुलिसवाली और उसके पति का प्रकरण, एक ही लड़की से यूपी के दो गुंडों का अमर प्रेम सेक्स के तड़के और फिल्म को हल्का करते है। लेकिन जाने भी दो यारों, क्योंकि मनोरंजक और महत्वपूर्ण, मज़ाक और व्यंग, फार्स और बकवास के बीच एक बारीक सी रेखा होती है जिसे समझ लिया गंगा पार, वरना तो सब ग–मज़ाकि तो है ही।  वैसे देख ही डालिए, क्योंकि कुछ ग—मज़ाकी देश-समाज के मानसिक स्वस्थ के लिए अतिआवश्यक भी होता है। 


बहुत हुआ सम्मान फिल्म Hotstar पर उपलब्ध है

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पुंज प्रकाश
पुंज प्रकाश
Punj Prakash is active in the field of Theater since 1994, as Actor, Director, Writer, and Acting Trainer. He is the founder member of Patna based theatre group Dastak. He did a specialization in the subject of Acting from NSD, NewDelhi, and worked in the Repertory of NSD as an Actor from 2007 to 2012.

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