Monday, September 20, 2021

नेलपॉलिश (फिल्म) : संभवनाओं की भ्रूणहत्या!

भारत में बेहतरीन कहानियों की कोई कमी नहीं है। जिधर भी नज़र घुमाइए, कहानी ही कहानी है लेकिन (अमूमन) भारतीय सिनेमा ने पता नहीं क्यों अपनेआप को ऐसा बना लिया है कि वहां आपको कहानी का भीषण आकाल देखने को मिलेगा। फ़िल्में लकीर की फ़क़ीर वाली प्रचंड फरेबी कहानी पर उत्पादित होती हैं, जिसका कोई तर्क और यथार्थ जगत से दूर-दूर तक का कोई सम्बंध नहीं होता। अनगिनत दशकों से सिनेमा के नाम पर फरेब बेचने का यह काम इतना अद्भुत तरीक़े से हुआ है और इसका मायजाल ऐसा फैला है कि अब लगता है सिनेमा का अर्थ है – अफीम की गोली, जिसने न केवल सिनेमावालों की सोच को कुंद कर दिया है बल्कि अपने लिए ऐसे ही नशे के गुलाम एक बहुत विशाल दर्शकवर्ग भी तैयार कर लिया है जो यथार्थ से परे होकर नशे में गिरफ़्त हो जाने को ही सिनेमा मानता है। अगर कोई इस मायाजाल को तोड़ने की चेष्टा भी करता है तो उसे इतने पापड़ बेलने होते हैं कि शायद दूबारा हिम्मत ही नहीं करे और वो भी समझौतावादी हो जाने के लिए अभिशप्त हो जाए।

नेलपॉलिश (फिल्म) 2006 में प्रकाश में आए निठारी कांड से शुरू तो होता है लेकिन बहुत ही जल्द यह हॉलीवुड की फिल्म प्राइमल फीयर के भीषण प्रभाव में आकर अपना सत्यनाश करने लगता है और फिर यह पता नहीं कहां-कहां हवाईक़िला बनाने लगता है और आप अपना सिर पकड़कर बैठ जाते हैं कि एक कल्ट फिल्म की रचना यहां की सकती थी लेकिन आदत के अनुसार लोग कल्टी मार गए क्योंकि लोड़ नहीं लेना है! अगर केवल निठारी कांड को ही बढ़िया से पड़ताल किया जाता और सच्चाई के साथ उसका सिनेमाई रूपांतरण होता तो यह एक दस्तावेज़ी और बेहद ज़रूरी फिल्म हो सकती है लेकिन फिर वही ढाक के तीन पात क्योंकि दिमाग में तो एडवर्ट नॉटन और रिचर्ड गियर की समाए हुए हैं और इस प्रकार सबकुछ होते हुए भी सारी संभावनाओं की भ्रूणहत्या हो जाती है, जिसमें आप न यहां के होते हैं और न वहां के यानि कि न आप हिंदी सिनेमा के रह पाते हैं और हॉलीवुड के, फिर मन कहता है कि जब यही देखना है तो एक बार पुनः प्राइमल फियर ही क्यों न देखा जाए?

हिंदी सिनेमावाले दर्शकों को मूढ़ समझना और मूढ़ बनाना जितना जल्दी छोड़ दें उतना ही ज़ल्दी सबका भला होगा। जब आप सिनेमा में यह घोषणा करते हैं कि नेलपॉलिश (फिल्म) सच्ची घटनाओं पर आधारित है तो आपका एक दायित्व भी बन जाता है कि सत्य की उस धूरी को पकड़कर पड़ताल करें और उसे सामने लाएं, वरना सिनेमाई छूट के नाम पर लूट का मज़ा लीजिए और मस्त रहिए।

भारतीय सिनेमा से जुड़े लोगों को थोड़ा साहित्य वगैरह पढ़ना चाहिए और पढ़ने-लिखने में भी उतनी ही मेहनत करनी चाहिए जितना कि सिक्स पैक बनाने के लिए किया जाता है। वैसे पैक का अभिनय से न कभी कोई सम्बंध रहा है और न रहेगा क्योंकि अभिनय बाहरी कम अन्दुरुनी प्रक्रिया ज़्यादा है। वैसे हिंदी सिनेमा की जो हालात है और उसने अब अपनेआप को जिस आडम्बर में जकड़ लिया है उसके मुकाबले यह फिल्म ठीक-ठाक ही कही जा सकती है लेकिन मानव कौल, रजित कपूर जैसे पढ़े-लिखे अभिनेता हैं तो थोड़ी उम्मीद किया जा सकता है और कथ्य के बीज में एक यादगार फिल्म होने की सारी संभावना यहां उपस्थित थी तो निराशा थोड़ी और ज़्यादा हो जाती है। सिनेमा से जुड़े निर्माता, निर्देशक और वितरकों को पढ़ने-लिखने और सिनेमा का अर्थ समझने की ज़रूरत है। इनके लिए शिक्षण और प्रशिक्षण का कार्यक्रम चलाया जाना चाहिए क्योंकि नेलपॉलिश (फिल्म) के एक बेहतरीन संवाद के अनुसार – “जुर्म दिमाग करता है, इंसान पर तो सिर्फ इल्ज़ाम लगते हैं।” तो दिमाग को सही प्रशिक्षण की ज़रूरत है वरना वो गुनाह पर गुनाह ही करता रहेगा।


नेलपॉलिश (फिल्म) ZEE5 पर उपलब्ध है।

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पुंज प्रकाश
पुंज प्रकाश
Punj Prakash is active in the field of Theater since 1994, as Actor, Director, Writer, and Acting Trainer. He is the founder member of Patna based theatre group Dastak. He did a specialization in the subject of Acting from NSD, NewDelhi, and worked in the Repertory of NSD as an Actor from 2007 to 2012.

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