Sunday, June 20, 2021

अंधेरे और उजाले भारत का द वाईट टाइगर (2021 फिल्म)

कुछ सिनेमा भाव-प्रधान होता है, कुछ दृश्य-प्रधान तो कुछ संवाद-प्रधान, वहीँ कुछ तर्क प्रधान भी होते ही हैं। फिल्म द वाईट टाइगर संवादमक्ता और दृश्यास्मक्ता के सहारे आगे अमूमन तार्किक रूप से बढती है और बीच-बीच में व्याप्त दृश्यास्मक्ता तक अगर आपने पहुंच बना ली तो बहुत सारे रहस्य का पर्दाफाश हो जाता है क्योंकि दृश्यों में वो ताक़त होती है जो बिना कुछ बोले बहुत कुछ बोल देती है। उदाहरण के लिए फिल्म के एक दृश्य पर ज़रा गौर फरमाइए – फिल्म का प्रधानपात्र (Protagonist) दिल्ली शहर में टट्टी करने के लिए झोपड़पट्टी के पास वाले गंदे जगह के ख़ाली मैदान में जाता है। वहां पहले से एक ग़रीबनुमा व्यक्ति खुले में शौच करने के लिए बैठा है। प्रधानपात्र अपनी पैंट खोलकर उसके पास और बिलकुल सामने बैठ जाता है और फिर उसके बाद दोनों ज़ोर-ज़ोर से ठहाका लगाते हुए मल त्याग कर रहे होते हैं। अब ज़रा इस दृश्य की व्याख्या करें तो पता चलता है कि दावे चाहे जितने भी बड़े-बड़े कर लिया जाए लेकिन आज भी भारत में सबके लिए शौचालय का सपना एक सपना ही है और आज भी बहुत सी ऐसी जगहें हैं जहां खुले में शौच किया जाता है। जो लोग यह कहते हैं कि इस बात में कोई सच्चाई नहीं है, उनके बारे में बस यही कहा जाएगा कि वो इस देश को केवल नेताओं के भाषण मात्र से जानते हैं, उन्हें धनिए और पुदीने का फ़र्क नहीं पता।

फिल्म द वाईट टाइगर, अरविन्द अडिगा का अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित पहला उपन्यास था। सन 2008 में प्रकाशित इस उपन्यास को 40वां मैन बुकर पुरस्कार जीतने का सम्मान भी प्राप्त है। यह फिल्म उसी उपन्यास पर आधारित है। यह वही वक्त था जब भारत उदारीकरण की नीति पर चलकर वैश्वीकरण के रथ पर सवार होकर अपनी मुक्ति का मार्ग(!) तलाश रहा था। तकनिकी क्रांति की शुरुआत हो चुकी थी इसलिए लोग आईटी सेक्टर में पैसा लगा रहे थे, बाक़ी आगे क्या हुआ उसका साक्षात् प्रमाण आज सामने है ही।  

फिल्म और उपन्यास दोनों चिट्ठी (इमेल) की शक्ल में है। चाईनीज़ प्रतिनिधि वेन जीबाओ भारत (बंगलौर) आनेवाले हैं और अंधेरे से उजाले(!) में नया-नया आया फिल्म का प्रधानपात्र बलराम हलवाई उन्हें इमेल लिख रहा है और साथ ही अपनी कहानी उन्हें बता रहा है। इस कहानी में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के ग़रीब नागरिक की गाथा में भारतीय राजनीत, जाति और वर्ग, धर्म से लेकर उन तमाम पहलुओं को समेटने की चेष्टा है जिससे वास्तविक जीवन में हर उस इंसान का पाला पड़ता ही है जो ग़रीब है। यह सब देखते हुए कभी ऐसा प्रतीत होता है जैसे सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक सत्य के यथार्थवादी पन्ने दर पन्ना कोई पलटता हुआ चल रहा है और हमारे सामने एक भारत की दो तस्वीर सामने खड़ी होती है – “Please understand, your Excellency, that India is two country in one: an India of light, and an India of Darkness।”  

अंधेरे और उजाले भारत का द वाईट टाइगर (2021 फिल्म)

फिल्म द वाईट टाइगर, इसी गरीबी के अंधेरे और अमीरी के उलाजे की कथा कहता है। अब यह अमीरी में उजाला होता है कि नहीं होता है, यह अपने-अपने हिसाब से आप तय कर लें लेकिन पूंजीवाद के इस ज़माने में यह भी नहीं कहा जा सकता कि वहां कुछ नहीं होता है और फिर यह सामजिक सत्य है ही कि यहां अमीर आदमी का कृत्य जायज है और ग़रीब आदमी की चाहत मात्र भी विद्रोह मान लिया जाता है। एक ग़रीब की क़िस्मत पहले से तय होती है और फिल्म के दृश्य में फिल्म बहुत अच्छे से समझाता है कि उसकी हालत पिजड़े में बंद उस मुर्गी या मुर्गे की तरह है जो पिंजड़े को ही अपनी दुनिया मान लेता है और अपने सामने कटते हुए मुर्गे को देखकर भी विद्रोह नहीं करता बल्कि मस्त रहता है, फिर जब उसकी कटने की बारी आती है तब बाक़ी सब उसी प्रकार मस्त रहते हैं। यहां आप चाहे तो जर्मन कवि पाश्तर नीमोलर की वो महानतम कविता First They Came याद कर सकते हैं, जिसकी आख़िरी की पंक्ति यह है –

फिर वो मेरे लिए आए

और तब तक कोई नहीं बचा था

जो मेरे लिए बोलता  

लेकिन बलराम अपनी इस नियति को मानने से इंकार कर देता है। वो द वाईट टाइगर है जो पीढ़ियों में एकाध बार जन्म लेता है लेकिन वो यह सब कोई जन जागृती या सामाजिक बदलाव के लिए नहीं (इतनी उसकी समझ ही नहीं है) करता बल्कि अमीरों के हथकंडे अपनाकर ही वहां से (अपने क्लास से) अपने आप मात्र को बाहर निकलता है। अब मुक्ति अकेले में अकेले कि होती है कि नहीं होती है, एक विमर्श का विषय यह भी है लेकिन अब चुकी यह इस फिल्म का विषय नहीं है इसलिए इसे फ़िलहाल यहीं हाशिए पर छोड़ देते हैं।    

पूरी फिल्म बड़ी कुशलता से सामाजिक वर्ग को ध्यानपूर्वक प्रदर्शित करती है। कई बार थोड़ा क्लिशे लग सकता है लेकिन शायद यह क्लिशेपन ही सामजिक सत्य हो! वैसे यह काम भारतीय फिल्म बनानेवालों को करना चाहिए था लेकिन वो तो ज़्यादातर सिनेमा के नाम पर पता नहीं क्या बेचने में व्यस्त हैं तो भारत के लिए यह काम कभी ब्रिटिश निर्देशक करता है तो कभी अमेरिकन। अब बाहर का आदमी करेगा तो संग्रहालय जैसा एहसास होना कोई आश्चर्यजनक बात भी नहीं है। जहां तक सवाल अभिनेताओं का है तो फिल्म में राजकुमार राव, प्रियंका चौपड़ा, महेश मांजरेकर जैसे नामी अभिनेता हैं लेकिन काम आदर्श ग्रोवर और नलनीश नील का अद्भुत है। कमलेश गिल, विजय मोर्या भी निराश नहीं करते लेकिन आदर्श ग्रोवर ने बलराम हलुआई के रूप में इस फिल्म में अभिनय के जिस आयाम को छुआ है, उसकी गूंज सुनाई देगी, देनी चाहिए और अगर न दे तो समझ लीजिए कि कुएं में भांग अच्छे से घोला जा चुका है। वो कहते हैं न कि अंदर से बदलो बाहर अपनेआप बदल जाएगा लेकिन समस्या यह है कि ज़्यादातर अभिनेता सिर्फ बाहरी आवरण को बदलने को ही चरित्र बदलना मान बैठे हैं, जो कहीं से भी उचित नहीं है। राजकुमार राव और महेश मांजरेकर एकरसता के शिकार हैं इसलिए उनको देखते हुए नएपन का एहसास नहीं होता और प्रियंका चोपड़ा के पास करने के लिए अलग से कुछ ख़ास है नहीं लेकिन जितना भी है ज़रूरी है और अच्छे से निभाया भी गया है।

फिल्म द वाईट टाइगर का सबसे कमज़ोर पक्ष है जगह-जगह इसका लंबा-लंबा एकालाप। वो न केवल फिल्म की गति में बाधा उत्पन्न करती है बल्कि सिनेमा को सिनेमा होने से भी रोकने का काम करती है। शायद उपन्यास के मोह ने सिनेमा को नैरेटिव होने के लिए विवश किया हो। इसके अलावा निर्देशक ने इसे बड़े ही कुशलता से बनाया है। फिल्म में कई ऐसे दृश्य हैं जो निर्देशक रामिन बहरनी की कल्पनाशीलता का बढ़िया उदाहरण प्रस्तुत करती है। फिल्म के कई सारे छोटे-छोटे दृश्य बड़े-बड़े व्याख्यान प्रस्तुत करते हैं। उदहारण के तौर पर बलराम अपने घर से भागते हुए बस में सवार होता है और बस में “चल छैंया-छैंया” या “आई एम हंटर, शी वांट टू शी माई गन” नहीं बल्कि ढ़ोलक की थाप के साथ यह गीत गाया जाता है –

सब केहू अब ब्यास हो गईल

भाषा भोजपुरिया के नाश हो गईल

फुहरे गवाता आ फुहरे सुनाता

गीतन में लईकी के नाम लिहल जाता

(हर कोई अब ब्यास (विद्वान) हो गया है, भोजपुरी भाषा के नाश हो गया है, अश्लील गाया जाता है, अश्लील सुना जाता है, गीतों में लड़कियों का नाम लिया जाता है)

अब फिल्म के इस छोटे से अंश ने भोजपुरी के गीत-संगीत और सिनेमा की वर्तमान स्थिति की वास्तविकता सामने लाकर रख देती है। इसका सिनेमा के मूल कथ्य से कोई सीधा लेना देना नहीं है लेकिन ऐसे जुड़ाव सिनेमा को बहुआयामी बनाते हैं। ऐसे अनेकानेक दृश्य पूरी फिल्म में हैं और ऐसे ही अर्थवान दृश्यास्मकता इस सिनेमा को बहुआयामी कलात्मकता प्रदान करते हैं। फिल्म के दृश्यबंध और छायांकन अच्छे हैं और वास्तविकता का बाख़ूबी आभास देते हैं। फिल्म के आख़िर में “जंगल मंत्र” नाम गाना आता है जिसमें एक लाइन आती है – The real animals are outside, but they shut ZOO!


द वाईट टाइगर (फिल्म) नेटफ्लिक्स पर उपलब्ध है।

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पुंज प्रकाश
पुंज प्रकाश
Punj Prakash is active in the field of Theater since 1994, as Actor, Director, Writer, and Acting Trainer. He is the founder member of Patna based theatre group Dastak. He did a specialization in the subject of Acting from NSD, NewDelhi, and worked in the Repertory of NSD as an Actor from 2007 to 2012.

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